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♦रायगढ़/ नई दिल्ली / सुप्रीम कोर्ट ने धर्मांतरण करने वालो को मिलने वाला आरक्षण समाप्त कर दिया है ।यह अभूतपूर्व फैसला दूरगामी एवं मील का पत्थर साबित होगा। अदालत ने अपने आदेश में पूर्णतः स्पष्ट कर दिया है कि हिंदू सामाजिक संरचना के अंतर्गत किसी पिछड़े वर्ग अथवा अनुसूचित जाति से संबंध रखने वाले व्यक्ति द्वारा अन्य धर्म स्वीकार कर लेने पर, उसे मूल धर्म में मिलने वाला आरक्षण नहीं मिलेगा देश की शीर्ष अदालत का यह निर्णय इस बुनियादी सिद्धांत को रेखांकित करता है कि किसी विशेष सामाजिक व्यवस्था के तहत मिलने वाला जातिगत पिछड़ापन, धर्म बदलते ही स्वयंमेव नए धर्म में हस्तांतरित नहीं होता। सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास उच्च न्यायालय के उस ऐतिहासिक निर्णय पर अपनी मुहर लगा दी है तमिलनाडु सरकार के परिवर्तन कर मुस्लिम बने व्यक्तियों को आरक्षण देने के प्रावधान को रद्द कर दिया गया था। संवैधानिक सिद्धांतों और विधि के शासन को सर्वोपरि रखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने इस संबंध में प्रस्तुत याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया।आरक्षण की व्यवस्था सामाजिक एवं शैक्षणिक पिछड़ेपन को दूर करने का एक संवैधानिक माध्यम है। मात्र पूर्व में किसी पिछड़ी जाति से जुड़े होने को आधार बनाकर दूसरे धर्म में प्रवेश के बाद आरक्षण का दावा नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रत्येक धर्म की अपनी अलग सामाजिक संरचना होती है, अतः एक धर्म विशेष की जातिगत विषमताओं व उसके लाभों को दूसरे धर्म पर लागू नहीं किया जा सकता। यह फैसला देश के नागरिकों को यह स्पष्ट संदेश देता है कि संवैधानिक अधिकारों और आरक्षण के लाभों का निर्धारण केवल संविधान द्वारा स्थापित न्याय संगत सीमाओं के भीतर ही संभव है।यह फैसला न केवल कानूनी परिदृश्य को एक निश्चित दिशा देता है, बल्कि यह देश के सामाजिक ताने-बाने व आरक्षण के मूल उद्देश्यों की रक्षा के दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आस्था चुनना प्रत्येक नागरिक का व्यक्तिगत अधिकार है, किंतु धर्म बदलने के साथ ही पूर्व धर्म की सामाजिक व्यवस्था के आधार पर दिए जाने वाले विशेष विशेषाधिकार समाप्त हो जाते हैं।
🔴रमेश पत्रकार 94252 52176




