🔵 छत्तीसगढ़ में रायगढ़ की माटी पर हाल ही में घटी एक वीभत्स घटना ने पूरे सभ्य समाज की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया है। महज़ सात सौ रुपए और एक प्लेट बिरयानी की खातिर चार नाबालिगों द्वारा एक युवक की निर्मम हत्या करने का सनसनीखेज मामला कोई मामूली अपराध या अकस्मात घटा हादसा नहीं है। यह गहरे सामाजिक और कानूनी पतन का जीवंत दस्तावेज है, जिसके प्रति यदि अब भी आँखें नहीं खोली तो आने वाला कल हमारी पीढ़ियों के लिए एक अभिशाप बन जाएगा।
पिछले कुछ समय के आंकड़ों और वारदातों पर सरसरी निगाह डालें, तो रायगढ़ से लेकर देश के कोने-कोने तक बलात्कार, अपहरण, लूट, मारपीट, चाकूबाजी और गुंडागर्दी जैसे संगीन अपराधों में नाबालिगों की बढ़ती संलिप्तता एक डरावना सच बनकर उभर रही है। लगभग हर बड़े अपराध के पीछे किसी न किसी अवयस्क का हाथ पाया जाना इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि बाल उम्र में अपराध का यह क्रेज अब एक महामारी का रूप धारण कर चुका है। दिल्ली के बहुचर्चित दामिनी कांड के उपरांत बाल अधिकारों की रक्षा और उनके सुधार के उद्देश्य से ‘जुवेनाइल जस्टिस एक्ट’ जैसी कानूनी विमर्शों और प्रावधानों को गढ़ा गया था। परंतु, आज की जमीनी हकीकत यह चीख-चीख कर कह रही है कि वह कानून इन शातिर होती प्रवृत्तियों के सामने पूरी तरह अपर्याप्त और बेअसर साबित हो रहा है।आज जब तीन साल का बच्चा मोबाइल चलता है ओर 10 साल का बच्चा जरूरतों एवं अधिकारों के हक की बात करता है ऐसे में ये बाल कानून बच्चों को सुधारने के लिए क्या पर्याप्त है क्या यह सच नहीं है कि हमारा बेबी जेन जी समय से पहले ही वयस्क हो रहा है तब क्या मौजूदा व्यवस्था व कानून में सुधार की जरूरत नहीं है ?
विडंबना यह है कि मौजूदा व्यवस्था से आज न तो विधि-विवादित बालकों के भीतर सुधार के कोई संकेत दिखाई दे रहे हैं और न ही उनके मन में कानून, खाकी की धमक या न्याय व्यवस्था का कोई भय शेष बचा है। वे यह भली-भांति जानते हैं कि कानून की किताबों में उनकी उम्र उनके लिए एक सबसे बड़ा रक्षा ‘कवच’ है, जिसका फायदा उठाकर वे बेखौफ होकर जघन्य कृत्यों को अंजाम दे रहे हैं। मासूमियत की चादर ओढ़े हाथों में तमंचे, चाकू और खौफनाक साजिशें यह बताने के लिए काफी हैं कि हमारा बाल सुधार गृह अब अपराधियों की नर्सरी बनता जा रहा है।
इस भयावह संकट की जड़ें केवल कानून की लचर व्यवस्था तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सामाजिक बुनावट और पारिवारिक उदासीनता में भी गहराई तक धंसी हुई हैं। अपराधों में संलिप्त अधिकांश बच्चे शहरी स्लम क्षेत्रों और निचली बस्तियों की वीरान गलियों से ताल्लुक रखते हैं। ये वे बदनसीब बच्चे हैं, जो या तो स्कूल की दहलीज कभी लांघ ही नहीं पाए या फिर किशोरावस्था की दहलीज पर पहुँचते ही कुसंगति के दलदल में धंस गए। इनके माता-पिता दो वक्त की रोटी की जद्दोजहद में इतने व्यस्त हैं कि उन्हें अपनी संतानों के भटकते कदमों की सुध तक नहीं रहती। आजीविका का अभाव और पारिवारिक नियंत्रण का शून्य होना इन मासूमों को सहज ही अपराध की अंधी और अमानवीय दुनिया की ओर धकेल देता है।

परवरिश एवं पालन पोषण के लिए जरूरी संसाधनों की सरकारी आपूर्ति ने भी परिवारों को लापरवाह व गैर जिम्मेदार बना दिया है जिसकी वजह से वे आधुनिक भौतिक सुविधाओं की चका चौंध ने भी उन्हें इस आपराधिक साम्राज्य की ओर आकर्षित करने में आग में घी का काम किया है यदि इस स्थिति की समीक्षा करे तो यह साफ पता चलता है कि सरकार की फ्री सर्विस के पहले भारत का बाल संसार ज्यादा महफ़ूज़ व सुरक्षित था जिसे देश की राजनीतिक पार्टियों ने वोट बैंक के लिए बर्बाद कर दिया।
यदि समय रहते इस नासूर पर कड़े प्रहार नहीं किए गए, तो आने वाले वक्त में जुर्म करने वाले इन मासूमों की एक ऐसी खौफनाक फौज खड़ी हो जाएगी,जिस से निपटना पुलिस प्रशासन के तो क्या पूरी न्याय व्यवस्था के बूते से बाहर हो जाएगा। यह केवल एक जिले या प्रदेश की समस्या नहीं है, बल्कि संपूर्ण राष्ट्र के भविष्य पर मंडराता हुआ एक बड़ा गंभीर संकट है।
अब वक्त आ गया है कि सरकार, न्यायपालिका और कानून निर्माता आत्ममंथन करें। सबसे पहले, जघन्य और गंभीर अपराधों (जैसे हत्या, बलात्कार, डकैती) में लिप्त नाबालिगों के संबंध में मौजूदा तय कानून एवं प्रावधानों और उम्र की सीमाओं की नए सिरे से समीक्षा की जानी चाहिए। अपराध का स्वरूप और उसकी क्रूरता के आधार पर यह तय होना चाहिए कि आरोपी पर शिकंजा कैसे कसा जाए, न कि केवल उसकी जन्मतिथि। इसके साथ ही, स्लम और पिछड़ी बस्तियों में समाज सुधार के व्यापक अभियान चलाए जाएं, शिक्षा की अलख जगाई जाए और काउंसलिंग के माध्यम से बच्चों को अच्छे और बुरे का अंतर का फर्क समझाया जाए।
आज हम इस विकट समस्या के समाधान के लिए कोई ठोस और निर्णायक कदम नहीं उठाएंगे, तो कल इतिहास हमें माफ नहीं करेगा। हुक्मरानों और कानूनी एजेंसियों को अपनी गहरी नींद से जागना होगा, अन्यथा यह चिंगारी एक दिन पूरे समाज को भस्म कर देगी।
🔴रमेश पत्रकार 94252 52176🔴




