*♦राजनीति लोकतंत्र का वह पावन मंदिर है जहाँ वैचारिक मतभेद और नीतियों के टकराव देश को एक नई दिशा देते हैं। वैचारिक विरोध हमेशा से लोकतंत्र की खूबी रहे हैं और आगे भी रहेंगे। लेकिन जब यह विरोध अपनी गरिमा और मर्यादा को लांघ कर व्यक्तिगत हमलों, गालियों और सड़क छाप भाषा तक उतर जाए, तो यह केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि संपूर्ण राष्ट्र और उसकी लोकतांत्रिक संस्कृति का अपमान बन जाता है। हाल ही में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ जिस अमर्यादित और निम्न स्तर की भाषा (“मोदी क्या, मोदी का बाप भी जाएगा”) का प्रयोग किया गया है, उसने देश की राजनीति के स्तर को पाताल के गर्त ने पहुंचा दिया।

यह बेहद दुखद और चिंताजनक है।राष्ट्रीय राजनीतिक दल के शीर्ष पद पर बैठा व्यक्ति यदि इस तरह के गली छाप गुंडे की भाषा का इस्तेमाल करेगा तो लगता है ,हम किसी सभ्य लोकतांत्रिक देश में नहीं, बल्कि किसी अराजक माफिया की बस्ती में रह रहे हैं। इतिहास गवाह है कि जब-जब मर्यादाओं की धज्जियां उड़ाई गई , तब-तब समाज को भारी कीमत चुकानी पड़ी है। आज विपक्ष द्वारा जिस प्रकार की ओछी और अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है, उसकी तुलना यदि महाभारत काल में द्रौपदी के चीरहरण से की जाए, तो वर्तमान स्थिति और भी अधिक लज्जाजनक और शर्मनाक प्रतीत होती है, जब महाभारत काल में भरी सभा में द्रौपदी का चीर हरण हुआ था, तब सभा में बैठे तमाम महारथियों और बड़े-बड़े दिग्गजों के सिर आत्मग्लानि, लज्जा और शर्म से नीचे झुक हुए थे। कई लोगों की आँखें आंसुओं से डूबी हुई थीं। उस कुकृत्य के समय किसी के चेहरे पर भी अभिमान, अहंकार या घमंड का भाव नहीं था, बल्कि हर कोई इस लज्जाजनक कृत्य के कारण ग्लानि की आग में जल रहा था।
इसके विपरीत, आज लोकतंत्र की इस खुली सभा में जो ‘भाषा का चीरहरण’ विपक्ष द्वारा किया जा रहा है, उसमें कोई पछतावा या शर्म नहीं है। तथाकथित ‘महारथी’ अपनी इस अभद्रता पर शर्मिंदा होने के बजाय उसे महिमामंडित करने में लगे हुए हैं। भाषा की मर्यादाओं को तार-तार करके गर्व महसूस करना, लोकतंत्र के मंदिर में इससे बड़ा पतन और क्या हो सकता है? देश के राजनीतिक इतिहास में विरोध के कई कड़वे दौर आए हैं, 1975 में तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी द्वारा देश में आपातकाल लगाकर लोकतंत्र की खुलेआम हत्या की गई थी, विरोधियों को जेलों में ठूंस दिया गया था और सारे मौलिक अधिकारों को बलपूर्वक बंधक बना लिया गया था।
उस तानाशाही और काले दौर के बावजूद, देश की जनता और विपक्ष ने अपने राजनीतिक विरोध के दायरे को कभी नहीं लांघा।
इंदिरा गांधी के लिए कभी भी इस प्रकार की घटिया, नीच और अभद्र भाषा का प्रयोग नहीं किया गया, उस दौर में न तो किसी ने उनके मरने की कामना की, न उनकी कब्र खोदी और न ही उनके मां- बाप पर किसी ने कोई अमर्यादित टिप्पणी की। आज जो लोग ‘वोट चोरी’ का राग अलाप रहे हैं, उन्हें देश का पुराना इतिहास भली-भांति याद है। वह दौर देश की जनता ने अपनी आँखों से देखा है:बंद कमरों में बैलेट पेपर पर धड़ल्ले से ठप्पे लगाए जाते थे। गरीबों को वोट डालने से रोकने के लिए पोलिंग बूथों पर खुलेआम कब्जा कर लिया जाता था।
डकैतों को बूथ लूटने का ठेका दिया जाता था बेलेट पेपर व पेटियां तालाब एवं कुओं और नदियों में तैरती पाई जाती थी ओर लोग चुनाव जीत जाते थे इसी वोट चोरी और तंत्र के बल पर 50 साल तक देश पर राज किया गया । वोट चोरी से सत्ता कैसे हथियाई जाती है, इसका उन्हें सबसे अच्छा और लंबा अनुभव है। यही कारण है कि आज जब देश में पारदर्शी चुनाव होते हैं, तब भी उन्हें अपनी ही चोरी के दिन याद आ जाते हैं। इस पर एक पुरानी कहावत बिल्कुल सटीक बैठती है— “सावन के अंधे को सब हरा ही हरा नजर आता है, और चोर को हर कोई चोर दिखता है।” यदि 2000 से पहले चुनाव कैसे कराए जाते थे और कैसे जीते जाते थे, इसका इतिहास पढ़ना हो, तो कांग्रेस से बेहतर कोई दूसरी यूनिवर्सिटी नहीं हो सकती। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि सिर्फ प्रधानमंत्री पद पर बैठे व्यक्ति की व्यक्तिगत बेइज्जती ही नहीं की जा रही, बल्कि देश की सुरक्षा करने वाली सेना से लेकर सर्वोच्च एजेंसियों—ईडी, सी बी आई और चुनाव आयोग तक को बेबुनियाद व अनर्गल आरोपों के कटघरे में खड़ा किया जा रहा है राजनीतिक स्वार्थ के लिए सार्वजनिक व संवैधानिक संस्थाओं को इस तरह बदनाम करना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है।
यदि प्रधानमंत्री या सरकार की नीतियों से विरोध है, तो उसके लिए संविधान और कानून में कई उचित रास्ते हैं। 1975 में भी राजनारायण ने कानून का रास्ता चुनकर अदालत में इंदिरा गांधी को चुनौती दी थी और उन्हें सत्ता से बेदखल होना पड़ा था विरोध का यह ‘ब्रह्मास्त्र’ आज भी विपक्ष के पास है, लेकिन वे कानूनी लड़ाई लड़ने के बजाय भाषा के स्तर को गिराकर देश के लोकतंत्र को ध्वस्त करने पर आमादा हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सिर्फ एक व्यक्ति नहीं हैं, बल्कि वे देश के 140 करोड़ नागरिकों द्वारा चुने गए प्रधान सेवक और देश के शीर्ष नेतृत्व हैं वे हमारे देश के राष्ट्र नायक हैं। उनकी माताजी का अपमान करना , उन्हें ‘मौत का सौदागर’, ‘जहरीला सांप’, ‘आतंकवादी’ या ‘तैमूर लंग’ जैसे विश्लेषणों से नवाजना और अब उनके पिता तक पर अमर्यादित टिप्पणी करना यह साबित करता है कि राजनीतिक विरोध के लिए अभद्रता करने की कोई सीमा नहीं रह गई है।
महाभारत के चीरहरण में तो कम से कम कौरवों की सभा में लज्जा व पश्चाताप के आंसू मौजूद थे,लेकिन आज की राजनीति में विपक्ष का यह आचरण उससे भी कई गुना अधिक शर्मनाक और भयावह है, जहाँ अभद्रता को गर्व के साथ परोसा जा रहा है ओर पूरी निर्लज्जता से महिमामंडित किया जा रहा है । देश के नायकों और देश के प्रधान का ऐसा अपमान कभी नहीं किया गया जवाहर लाल नेहरू से लेकर मोदी से पहले तक जितने भी प्रधान मंत्री हुए देश ने उन्हें सम्मान के साथ देखा व नवाजा है नेहरू को पंडित जी चाचा ओर आधुनिक भारत का जनक शांतिदूत तो इंदिरा गांधी को प्रियदर्शिनी,आयरन लेडी, दृढ़ निश्चयी, दुर्गा ,राजीव गांधी को मिस्टर क्लीन,कम्यूटर जी,नरसिम्हा राव को भारत का चाणक्य ,आर्थिक सुधारों का जनक चौधरी चरणसिंह को किसानों का मसीहा देवीलाल को ताऊ ओर किंग मेकर , मोरार जी भाई को सिद्धांतवादी नेता व इंद्र कुमार गुजराल को डॉक्ट्रिन का प्रणेता,मनमोहन सिंह को अर्थशास्त्री कहा व माना जाता है लेकिन 2014 में लगे झटके से विपक्ष का मानसिक संतुलन इतना बिगड़ा कि वो विकृति का शिकार हो गई जिसके गहरे सदमे से वो आज तक नहीं उबर पाई और अनर्गल प्रलाप उसकी पहचान बन गया है इसका खामियाजा वो भोग रही है ओर यदि इस बौद्धिक विकलांगता से वो नहीं उबरेगी तो आगे भी उसे इसके दुष्परिणाम भुगतने पड़ेंगे यह तय हैं । जय हिंद
*🔴संपादक रमेश अग्रवाल रायगढ़*
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