
जून 2026 की FMGE परीक्षा के नतीजे आने के बाद शुरू हुआ विवाद एक बार फिर दिल्ली की सड़कों पर पहुंच गया है. विदेशी मेडिकल कॉलेजों से पढ़ाई करने वाले भारतीय मेडिकल ग्रेजुएट्स यानी FMGs में से सिर्फ 12.38 फीसदी उम्मीदवार ही परीक्षा पास कर पाए. इसके बाद पेपर के कठिन स्तर, वीडियो आधारित सवालों, परीक्षा केंद्रों की व्यवस्था और पारदर्शिता को लेकर सवाल उठे.NBEMS ने शिकायतों की जांच के लिए तीन सदस्यीय स्वतंत्र समिति भी बनाई और भविष्य की परीक्षाओं में कई बदलावों की सिफारिश हुई लेकिन जून परीक्षा में शामिल उम्मीदवारों को मुआवजा या ग्रेस मार्क्स देने की मांग पूरी नहीं हुई. इसी मुद्दे पर अब कुछ उम्मीदवार भूख हड़ताल पर हैं.
जून FMGE में सिर्फ 12.38 फीसदी उम्मीदवार हुए पास
विदेश से मेडिकल की पढ़ाई करने वाले भारतीय छात्रों के लिए फॉरेन मेडिकल ग्रेजुएट एग्जामिनेशन (FMGE)बेहद महत्वपूर्ण परीक्षा है. इसे नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन इन मेडिकल साइंसेज यानी NBEMS आयोजित करता है. इस परीक्षा को पास करने के बाद ही विदेशी मेडिकल डिग्री रखने वाले उम्मीदवार भारत में डॉक्टर के तौर पर प्रैक्टिस करने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं.जून 2026 में आयोजित FMGE में कुल 37,448 उम्मीदवार शामिल हुए लेकिन इनमें से सिर्फ 12.38 फीसदी उम्मीदवार ही सफल हो सके.कम पास प्रतिशत सामने आने के बाद उम्मीदवारों में नाराजगी फैल गई. उनका आरोप था कि इस बार पेपर सामान्य से काफी कठिन था. इसके अलावा वीडियो आधारित सवालों को पर्याप्त पहले जानकारी दिए बिना परीक्षा में शामिल किया गया. कुछ उम्मीदवारों ने परीक्षा केंद्रों की व्यवस्थाओं और परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर भी सवाल उठाए.
10 जुलाई को रिजल्ट आने के बाद शुरू हुआ विरोध
उम्मीदवारों के मुताबिक उनका आंदोलन अचानक शुरू नहीं हुआ. 10 जुलाई 2026 को जून FMGE का रिजल्ट जारी होने के बाद कम पास प्रतिशत विरोध का सबसे बड़ा मुद्दा बन गया.जुलाई में उम्मीदवारों ने लगातार प्रदर्शन किया. मामला धीरे-धीरे दिल्ली तक पहुंचा और 3 अगस्त को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया गया.इस प्रदर्शन में ऑल इंडिया मेडिकल स्टूडेंटस एसोसिएशन–फॉरेन मेडिकल स्टूडेंटस विंग (AIMSA-FMSW)और ऑल एफएमजी एसोसिएशन (AFA)के प्रतिनिधि भी शामिल थे.प्रदर्शन के बाद उम्मीदवारों के प्रतिनिधियों को NBEMS अधिकारियों के साथ बातचीत के लिए बुलाया गया.
NBEMS ने तीन सदस्यीय स्वतंत्र समिति बनाई
3 अगस्त के प्रदर्शन के बाद NBEMS ने उम्मीदवारों की शिकायतों की जांच के लिए तीन सदस्यीय स्वतंत्र समिति गठित की.समिति को जून 2026 की FMGE परीक्षा के आयोजन और उसके परिणाम की समीक्षा करने की जिम्मेदारी दी गई. उम्मीदवारों ने इसके बाद अपना आंदोलन कुछ समय के लिए स्थगित कर दिया, क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि बातचीत के जरिए उनकी समस्याओं का समाधान निकल सकता है.प्रदर्शन कर रहे उम्मीदवारों के अनुसार शुरुआती बैठकों से उन्हें लगा कि उनकी शिकायतों पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है.प्रदर्शनकारी उम्मीदवारों के प्रमुख प्रतिनिधि और वर्तमान में भूख हड़ताल पर बैठे डॉ.जसवंत सिंह यादव के अनुसार बोर्ड की ओर से उन्हें बताया गया था कि उत्तर कुंजी, पेपर की कठिनाई, वीडियो आधारित सवाल, परीक्षा शुल्क और दूसरी शिकायतों की जांच की जाएगी लेकिन बातचीत आगे बढ़ने के साथ सबसे महत्वपूर्ण मांग पर सहमति नहीं बन सकी.
जून परीक्षा देने वालों के लिए मुआवजा बना सबसे बड़ा मुद्दा
प्रदर्शन कर रहे उम्मीदवारों की सबसे बड़ी मांग है कि जून 2026 FMGE में शामिल उम्मीदवारों को किसी तरह की राहत या मुआवजा दिया जाए.उम्मीदवारों का कहना है कि अगर बोर्ड ने भविष्य की परीक्षाओं में कई बदलाव जरूरी माने हैं तो जून की परीक्षा देने वाले उम्मीदवारों को भी उसका लाभ मिलना चाहिए.उनका कहना है कि वे यह नहीं मांग रहे कि उन्हें बिना परीक्षा पास घोषित कर दिया जाए. वे सिर्फ एक बार के लिए रियायत या मुआवजे की मांग कर रहे हैं.इंडियन एक्सप्रेस में छपी रिपोर्ट में बताया गया है कि प्रदर्शन करने वाले स्टूडेंटस की टीम के कोर सदस्य डॉ.आशीष कुमार ने कहा कि अगर परीक्षा में ऐसी कमियां थीं जिनके कारण आगे के लिए बदलाव जरूरी माने गए हैं तो जून बैच को भी किसी तरह की राहत मिलनी चाहिए.
समिति ने कई बदलाव सुझाए, लेकिन ग्रेस मार्क्स की सिफारिश नहीं की
विशेषज्ञ समिति ने परीक्षा को लेकर कई बदलावों की सिफारिश की है. इनमें कम कठिनाई वाले सवालों का अनुपात बढ़ाने का प्रस्ताव भी शामिल है.इसके अलावा अगर भविष्य में मल्टीमीडिया या वीडियो आधारित सवाल पूछे जाते हैं तो उम्मीदवारों को इसके बारे में पहले से जानकारी देने की सिफारिश की गई है.बायोमेट्रिक प्रक्रिया के लिए तीन मिनट की अतिरिक्त समय-सीमा देने की संभावना पर भी समिति ने सुझाव दिया है.सबसे अहम बात यह है कि समिति ने वीडियो आधारित सवालों को कम से कम एक साल तक FMGE में दोबारा शामिल नहीं करने की सिफारिश की है लेकिन समिति ने जून 2026 के उम्मीदवारों को ग्रेस मार्क्स या मुआवजा देने की सिफारिश नहीं की. समिति का कहना था कि उपलब्ध सबूतों से यह साबित नहीं होता कि जिन मुद्दों की जांच की गई उनका परीक्षा के परिणाम पर कोई महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा. इसके अलावा समिति ने FMGE में पास होने के लिए तय कानूनी मानकों का भी हवाला दिया.यही फैसला अब उम्मीदवारों के दोबारा सड़क पर उतरने की बड़ी वजह बन गया है.
24 घंटे का भरोसा भी बना विवाद का कारण
प्रदर्शनकारी उम्मीदवारों ने एक और बैठक का जिक्र किया है जिसके बाद विवाद और बढ़ा.उम्मीदवारों के मुताबिक NBEMS के प्रतिनिधियों ने उन्हें 24 घंटे का समय मांगा था.कहा गया था कि कुछ छात्र प्रतिनिधियों को परीक्षा के सवाल दिखाने की अनुमति लेने की कोशिश की जाएगी.उम्मीदवार इसके लिए तैयार हो गए थे. उनका कहना है कि पांच प्रतिनिधि सवाल देखना चाहते थे खासकर वीडियो आधारित सवाल ताकि यह साफ हो सके कि ऐसे कितने सवाल पूछे गए थे और उनकी प्रकृति क्या थी लेकिन उम्मीदवारों के अनुसार 24 घंटे बीतने के बाद भी उन्हें कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला.उनका कहना है कि उन्होंने और इंतजार किया और करीब 56 घंटे बाद 20 अगस्त को NBEMS कार्यालय पहुंचकर स्थिति जानने की कोशिश की.उम्मीदवारों के अनुसार बातचीत के इस दौर में भी समाधान नहीं निकला और इसके बाद उन्होंने दोबारा आंदोलन शुरू करने का फैसला किया.
वीडियो आधारित सवाल आखिर इतना बड़ा मुद्दा क्यों हैं?
FMGE में वीडियो आधारित सवाल इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बने हुए हैं.परंपरागत रूप से FMGE एक कंप्यूटर आधारित परीक्षा है जिसमें कुल 300 सवाल होते हैं और परीक्षा अलग-अलग शिफ्ट में आयोजित की जाती है.उम्मीदवारों के पास औसतन एक सवाल के लिए करीब एक मिनट का समय होता है.प्रदर्शनकारी उम्मीदवारों का आरोप है कि इस बार क्लिनिकल स्थिति पर आधारित वीडियो सवाल पहले जानकारी दिए बिना पूछे गए.उनका कहना है कि वीडियो देखने, सवाल पढ़ने और विकल्पों का विश्लेषण करने में सामान्य सवालों की तुलना में ज्यादा समय लगता है. ऐसे में बाकी सवाल हल करने के लिए उपलब्ध समय प्रभावित हुआ.प्रदर्शनकारी रफीक ने दावा किया कि उम्मीदवारों को करीब 20 से 22 वीडियो आधारित सवाल देखने पड़े हालांकि इन सवालों की संख्या को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं.विशेषज्ञ समिति ने भी वीडियो और मल्टीमीडिया आधारित सवालों को लेकर भविष्य में उम्मीदवारों को पर्याप्त पहले जानकारी देने की सिफारिश की है. समिति ने इन्हें FMGE में कम से कम एक साल तक रोकने की भी सिफारिश की है.प्रदर्शनकारी इसी सिफारिश को अपने पक्ष में बड़ा आधार मान रहे हैं.उनका तर्क है कि जब भविष्य की परीक्षा में इस तरह के बदलाव की जरूरत महसूस हुई है तो जून बैच को भी राहत मिलनी चाहिए थी.
NBEMS और NMC का तर्क क्या है?
दूसरी तरफ NBEMS और National Medical Commission (NMC)की ओर से वीडियो आधारित सवालों को लेकर अलग तर्क दिया गया है.NMC के वरिष्ठ अधिकारियों ने पहले कहा था कि वीडियो आधारित सवालों के जरिए डॉक्टर की क्लिनिकल समझ, लक्षण और जांच से जुड़ी स्थितियों को बेहतर तरीके से परखा जा सकता है.ऐसी कई चीजें सिर्फ स्थिर तस्वीरों के जरिए सही तरीके से नहीं जांची जा सकतीं.अधिकारियों का कहना है कि इस तरह के सवाल मेडिकल ट्रेनिंग के अनुरूप हैं और FMGE का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था में काम करने वाले डॉक्टर न्यूनतम जरूरी दक्षता के मानक को पूरा करते हों यानी अधिकारियों का पक्ष यह है कि परीक्षा का स्तर सिर्फ उम्मीदवारों को पास करने के लिए नहीं, बल्कि भारत में मरीजों का इलाज करने वाले डॉक्टरों की न्यूनतम क्षमता सुनिश्चित करने के लिए तय किया जाता है.




