
*♦पांच साल पहले मणिपुर की पहाड़ियों में गोलियों और बारूद के बीच 46 असम राइफल्स के कमांडिंग ऑफिसर कर्नल विप्लव त्रिपाठी , उनकी पत्नी अनुजा व पांच साल के मासूम बेटे अबीर ने देश के लिए जो सर्वोच्च बलिदान दिया था, वह भारतीय सैन्य इतिहास के सबसे खौफनाक और दुर्लभ अध्यायों में से एक है।उग्रवादियों ने केवल एक सैन्य अधिकारी को नहीं, बल्कि उसकी पूरी गृहस्थी को खत्म कर एक कायराना संदेश देने की कोशिश की थी। रायगढ़ के इस सपूत ने आखिरी दम तक अदम्य साहस का परिचय देते हुए मुकाबला किया था। राहत की बात यह है कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने इस हत्या कांड के मुख्य आरोपियों में से एक—4 लाख के इनामी पीएलए कैप्टन थियाम बोयचा सिंह को पांच साल बाद दबोच लिया है। लेकिन इस गिरफ्तारी के बीच एक ऐसा काला सच खड़ा है जो व्यवस्था की संवेदनाओं को झकझोर कर रख देता है। आज पांच साल बीत जाने के बाद भी इस वीर परिवार को कर्नल विप्लव त्रिपाठी के लिए गैलेंट्री अवॉर्ड (वीरता सम्मान) की भीख मांगनी पड़ रही है। सरकार और सेना के गलियारों से केवल एक ही बेतुका जवाब मिलता है—”शहादत के दो वर्ष के भीतर यूनिट की ओर से नाम नहीं भेजा गया।” यह कु–तर्क अपने आप में अत्यंत शर्मनाक हास्यास्पद और क्रूरता से भरा हुआ है

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*_व्यवस्था के गलियारों_*
*_में दम तोड़ती शहादत_*
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सवाल यह उठता है कि क्या देश के लिए प्राणों की आहुति देने वाले शहीद को अब वीरता के लिए ‘कागजी घोड़ों’ और लालफीताशाही का मोहताज होना पड़ेगा? यदि बटालियन स्तर पर प्रशासनिक देरी या कागजी खानापूर्ति में चूक हुई भी, तो उसकी सजा शहीद के माता- पिता और उनके बलिदानी परिवार को क्यों भुगतनी चाहिए ? क्या प्रशासनिक औपचारिकताएं किसी सैनिक के अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान से ऊपर हो सकती हैं ? यह पूरी व्यवस्था पर एक करारा तमाचा है कि जिस अधिकारी ने करोड़ों के नशीले पदार्थों के अवैध कारोबार की कमर तोड़कर देश की आंतरिक सुरक्षा को मजबूत किया, उसके अपनों को आज न्याय और सम्मान के लिए दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं।
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*_लालफीताशाही के दलदल में_*
*_फंसा शहीद का बलिदान_*
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देश में वोट ओर नौकरशाही ने सारे मूल्यों को बौना बना दिया है सैकड़ों बेगुनाहों के खून से हाथ रंगने वाले आतंकवादी एवं नक्सलियों को सरकार महिमा मंडित कर उन्हें सौगाते बाट रही हे लेकिन एक ऐसे सैन्य अधिकारी को वीरता का पुरस्कार देने में हिला हवाला कर रही हे जिसने देश पर पूरा परिवार कुर्बान कर दिया शहादत कोई राजनीतिक सौदा या कागजी दस्तावेज नहीं है, यह देश की अस्मिता का प्रतीक है। सरकार को इस लफाजी व कागजी लिफाफेबाजी को तुरंत दरकिनार करना चाहिए बिना एक पल गंवाए कर्नल विप्लव त्रिपाठी को उनका बनता हुआ वीरता सम्मान दिया जाना चाहिए, और इस पांच साल के अवांछित विलंब के लिए देश व सरकार को उनके शोक संतप्त माता -पिता से क्षमा मांगनी चाहिए। यही उस वीर की शहादत को सच्ची श्रद्धांजलि होगी वरना इतिहास किसी को माफ नहीं करता वक्त आने पर सबका हिसाब होता हे जो आज अपनी जिम्मेदारी को कागज के टुकड़ों से ढकने की कोशिश कर रहे है समय उनका भी हिसाब करेगा वीर किसी मेडल व सम्मान के लिए अपने लहु से धरती लाल नहीं करता वो देश के लिए उसके जज्बे व कर्तव्य का धार्मिक अनुष्ठान हे जिसमें देश के मान सम्मान मर्यादा व गौरव के लिए वो अपनी आहुति देता है यदि उसके इस समर्पण व त्याग का अपमान हुआ तो उसका खमियाजा भी हमें ही भुगतना होगा इसलिए देर ही सही लेकिन गलती दुरुस्त की जा सकती है सरकार को यह करना भी चाहिए क्योंकि यही उसका कर्तव्य वो धर्म भी है कर्नल विप्लव त्रिपाठी के साथ हो रही इस नाइंसाफी पर एक अंजान शायर का शेर है………………..
“*_शहादत कोई सौदा नहीं, न कोई व्यापार है,यह देश के वीरों का_* *_सर्वोच्च बलिदान है, जो अपमान करते हैं इन हुतात्माओं के लहू का,याद रखना, इतिहास उसका भी करता है हिसाब !”_*
यदि हरि ओम पवार के ओजस्वी शब्दों में कहा जाए तो
*_जिन बेटो ने पर्वत काटे है अपने नाखूनो से_*
*_उनकी कोई मांग नही है दिल्ली के दरबारों से_*
*_सेना मर-मर कर पाती है, दिल्ली सब खो देती है_* *_और शहीदों के लौहू को, स्याही से धो देती है…_*
शायद उन्होंने इन कुव्यवस्था की परिकल्पना पहले ही कर ली थी तभी तो उन्होंने इस झकझोर देने वाली कविता की संरचना कर दी थी इस के साथ एक स्वरचित तुकबंदी भी है में साहित्यकार या कवि तो नहीं हूं यह सिर्फ मेरे मन की भड़ास है जो शब्दों में व्यक्त हो रही है
*मिट्टी के कण-कण में उनकी,आज भी महकती है कुर्बानी,*
*सीमा पर बहते लहू से लिखी गई, जिनकी अमर कहानी।*
*उनके सम्मान व त्याग पर, सियासत का पहरा मत डालो,*
*मत करो ऐसी बेहियाई तुम शर्म करो ए कुर्सी के मतवारों*
*रमेश*
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*जय हिंद,जय भारत,जय जवान,* ********************************
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*🔴संपादक रमेश पत्रकार*
*94252 52176* 7000654928*
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